| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » सर्ग 51: निषादराज गुह के समक्ष लक्ष्मण का विलाप » श्लोक 5 |
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| | | | श्लोक 2.51.5  | अस्य प्रसादादाशंसे लोकेऽस्मिन् सुमहद् यश:।
धर्मावाप्तिं च विपुलामर्थकामौ च पुष्कलौ॥ ५॥ | | | | | | अनुवाद | | श्री रघुनाथजी की कृपा से ही मैं इस लोक में महान यश, अपार धर्मलाभ, प्रचुर धन और भोग की आशा करता हूँ। 5॥ | | | | 'It is only from the blessings of Shri Raghunathji that I hope to attain great fame in this world, immense religious benefits and abundant wealth and enjoyment.' 5॥ | | ✨ ai-generated | | |
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