श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 51: निषादराज गुह के समक्ष लक्ष्मण का विलाप  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  2.51.3 
उचितोऽयं जन: सर्व: क्लेशानां त्वं सुखोचित:।
गुप्त्यर्थं जागरिष्याम: काकुत्स्थस्य वयं निशाम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
'यह सेवक (मैं) और इसके साथ के सब लोग वनवासी होने के कारण सब प्रकार के क्लेश सहने में समर्थ हैं (क्योंकि हम सब दुःख सहने के आदी हैं), परन्तु तुम्हारा पालन-पोषण सुख-सुविधाओं में हुआ है, अतः तुम भी उसी के अधिकारी हो (अतः सो जाओ)। हम सब लोग श्री रामचन्द्रजी की रक्षा के लिए सारी रात जागते रहेंगे॥ 3॥
 
'This servant (I) and all the people with him are capable of bearing all kinds of troubles because they are forest dwellers (because we are all accustomed to bearing pain), but you have been brought up in comfort, so you deserve the same (so go to sleep). We all will remain awake the whole night to protect Shri Ramchandraji.॥ 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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