श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 50: श्रीराम का शृङ्गवेरपुर में गङ्गा तट पर पहुँचकर रात्रि में निवास, वहाँ निषादराज गुह द्वारा उनका सत्कार  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  2.50.7 
तथा विलपतां तेषामतृप्तानां च राघव:।
अचक्षुर्विषयं प्रायाद् यथार्क: क्षणदामुखे॥ ७॥
 
 
अनुवाद
श्री रामजी के दर्शन से उनकी आँखें अभी भी तृप्त नहीं हुई थीं और वे अभी भी पूर्वोक्त रीति से विलाप कर रहे थे, कि तभी श्री रघुनाथजी उनकी दृष्टि से ऐसे अदृश्य हो गए, जैसे प्रातःकाल में सूर्य छिप जाता है।
 
His eyes were still not satisfied with the sight of Sri Rama and he was still lamenting in the aforesaid manner, when Sri Raghunatha disappeared from his sight, just as the Sun hides during the dawn.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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