श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 50: श्रीराम का शृङ्गवेरपुर में गङ्गा तट पर पहुँचकर रात्रि में निवास, वहाँ निषादराज गुह द्वारा उनका सत्कार  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.50.5 
अनुक्रोशो दया चैव यथार्हं मयि व: कृत:।
चिरं दु:खस्य पापीयो गम्यतामर्थसिद्धये॥ ५॥
 
 
अनुवाद
'तुमने मुझ पर बड़ी कृपा की है और मुझ पर यथायोग्य दया की है। तुमने मेरे लिए बहुत समय तक कष्ट सहा है। तुम्हारा इतने समय तक दुःख सहना अच्छा नहीं है; इसलिए अब तुम सब जाकर अपना-अपना काम करो।'॥5॥
 
‘You have been very kind to me and have shown me due mercy. You have suffered for me for a long time. It is not good for you to remain in pain for so long; therefore, now you all go and do your respective work.'॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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