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श्लोक  2.5.3-4 
तथेति च स राजानमुक्त्वा वेदविदां वर:।
स्वयं वसिष्ठो भगवान् ययौ रामनिवेशनम्॥ ३॥
उपवासयितुं वीरं मन्त्रविन्मन्त्रकोविदम्।
ब्राह्मं रथवरं युक्तमास्थाय सुधृतव्रत:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
तदनन्तर राजा से ‘तथास्तु’ कहकर विद्वानों में श्रेष्ठ और व्रतों के उत्तम भक्त भगवान वशिष्ठ स्वयं ब्राह्मण द्वारा जुते हुए उत्तम रथ पर आरूढ़ होकर वीर श्री राम को व्रत की दीक्षा देने के लिए श्री राम के महल की ओर चले॥3-4॥
 
Then, after saying 'Tathaastu' to the king, Lord Vashishtha, the best among the learned scholars and the best devotee of the fasts, himself mounted on the best chariot harnessed by a Brahmin and proceeded towards Shri Ram's palace to give the initiation to the brave Shri Ram in fasting. 3-4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)