श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 5: वसिष्ठजी का सीता सहित श्रीराम को उपवास व्रत की दीक्षा देना,राजा दशरथ का अन्तःपुर में प्रवेश  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  2.5.18 
सिक्तसम्मृष्टरथ्या हि तथा च वनमालिनी।
आसीदयोध्या तदह: समुच्छ्रितगृहध्वजा॥ १८॥
 
 
अनुवाद
उस दिन वन और उद्यानों की पंक्तियों से सुशोभित अयोध्यापुरी में घर-घर में ऊँची-ऊँची ध्वजाएँ लहरा रही थीं; उसकी सब गलियाँ और सड़कें झाड़-बुहारकर सींची गई थीं॥ 18॥
 
That day, Ayodhyapuri, adorned with rows of forests and gardens, had tall flags flying in every house; all its streets and roads had been swept and sprinkled.॥ 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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