श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 49: ग्रामवासियों की बातें सुनते हुए श्रीराम का कोसल जनपद को लाँघते हुए आगे जाना और वेदश्रुति, गोमती एवं स्यन्दि का नदियों को पार करके सुमन्त्र से कुछ कहना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  2.49.15 
कदाहं पुनरागम्य सरय्वा: पुष्पिते वने।
मृगयां पर्यटिष्यामि मात्रा पित्रा च संगत:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
'सूत! मैं कब लौटकर अपने माता-पिता से मिलूँगा और सरयू के तट पर पुष्पित वनों में शिकार की खोज में घूमूँगा?॥15॥
 
'Suta! When will I return and meet my parents and roam in search of hunting in the flowering forests on the banks of the Sarayu?॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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