श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 47: प्रातःकाल उठने पर पुरवासियों का विलाप करना और निराश होकर नगर को लौटना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  2.47.9 
किं वक्ष्यामो महाबाहुरनसूय: प्रियंवद:।
नीत: स राघवोऽस्माभिरिति वक्तुं कथं क्षमम्॥ ९॥
 
 
अनुवाद
(यदि कोई हमसे श्री रामकथा पूछे, तो हम उसे क्या उत्तर देंगे?) क्या हम कहेंगे कि हमने महाबाहु श्री रघुनाथजी को, जो किसी के दोष नहीं देखते और मधुर वचन बोलते हैं, वन में भेज दिया? हाय! ऐसी अयोग्य बात हमारे मुख से कैसे निकल सकती है?॥9॥
 
‘(If someone asks us about the story of Shri Ram, what answer will we give him?) Will we say that we have sent the mighty-armed Shri Raghunathji, who does not see anyone's faults and speaks the sweetest words, to the forest? Alas! How can such an unworthy statement come out of our mouth?॥ 9॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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