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श्लोक 2.47.19  |
ते तानि वेश्मानि महाधनानि
दु:खेन दु:खोपहता विशन्त:।
नैव प्रजग्मु: स्वजनं परं वा
निरीक्ष्यमाणा: प्रविनष्टहर्षा:॥ १९॥ |
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| अनुवाद |
| उसके हृदय का सारा हर्ष लुप्त हो गया था। वह दुःख से पीड़ित होकर बड़े कष्ट से उन भव्य भवनों में प्रविष्ट हुआ और सबको देखते हुए भी अपने-पराये का भेद न कर सका॥19॥ |
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| All the joy in his heart had vanished. Being afflicted with grief, he entered those grand houses with great pain and despite seeing everybody, he could not distinguish between his own and others.॥ 19॥ |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तचत्वारिंश: सर्ग:॥ ४७॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४७॥ |
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