श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 46: सीता और लक्ष्मण सहित श्रीराम का रात्रि में तमसा-तट पर निवास, पुरवासियों को सोते छोड़कर वन की ओर जाना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  2.46.3 
पश्य शून्यान्यरण्यानि रुदन्तीव समन्तत:।
यथानिलयमायद्भिर्निलीनानि मृगद्विजै:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
'इन निर्जन वनों को देखो, वन्य पशु-पक्षी अपने-अपने स्थान पर आकर अपनी-अपनी भाषा बोल रहे हैं। सारा वन उनकी वाणी से भर गया है, मानो ये सारे वन हमें इस दशा में देखकर दुःखी हो रहे हैं और सब ओर से रुदन कर रहे हैं।॥3॥
 
‘Look at these deserted forests, the wild animals and birds have come to their respective places and are speaking in their own language. The entire forest is filled with their voices, as if all these forests are saddened to see us in this state and are crying from all sides.॥ 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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