श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 46: सीता और लक्ष्मण सहित श्रीराम का रात्रि में तमसा-तट पर निवास, पुरवासियों को सोते छोड़कर वन की ओर जाना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  2.46.19 
अस्मद्‍व्यपेक्षान् सौमित्रे निर्व्यपेक्षान् गृहेष्वपि।
वृक्षमूलेषु संसक्तान् पश्य लक्ष्मण साम्प्रतम्॥ १९॥
 
 
अनुवाद
'सुमित्रपुत्र लक्ष्मण! इन नगरवासियों को देखो, ये अभी वृक्षों की जड़ों से टिककर सो रहे हैं। ये केवल हमें ही चाहते हैं। ये अपने घरों के प्रति भी पूर्णतः उदासीन हो गए हैं।॥19॥
 
'Lakshman, son of Sumitra! Look at these city dwellers, they are sleeping right now, leaning against the roots of the trees. They only want us. They have become completely indifferent even towards their homes.॥ 19॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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