श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 46: सीता और लक्ष्मण सहित श्रीराम का रात्रि में तमसा-तट पर निवास, पुरवासियों को सोते छोड़कर वन की ओर जाना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  2.46.11 
एवमुक्त्वा तु सौमित्रिं सुमन्त्रमपि राघव:।
अप्रमत्तस्त्वमश्वेषु भव सौम्येत्युवाच ह॥ ११॥
 
 
अनुवाद
लक्ष्मण से ऐसा कहकर श्री रामचन्द्रजी ने सुमन्त्र से भी कहा - 'भद्र! अब तुम घोड़ों की रक्षा में ध्यान लगाओ। उनके विषय में प्रमाद मत करो।'॥11॥
 
Having said this to Lakshmana, Shri Ramchandraji also said to Sumantr - 'Gentle one! Now you should concentrate on the protection of the horses. Do not be careless about them.'॥ 11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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