श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 46: सीता और लक्ष्मण सहित श्रीराम का रात्रि में तमसा-तट पर निवास, पुरवासियों को सोते छोड़कर वन की ओर जाना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  2.46.10 
अद्भिरेव हि सौमित्रे वत्स्याम्यद्य निशामिमाम्।
एतद्धि रोचते मह्यं वन्येऽपि विविधे सति॥ १०॥
 
 
अनुवाद
'सुमित्रनन्दन! यद्यपि यहाँ अनेक प्रकार के जंगली फल और मूल-मूल मिलते हैं, फिर भी मैं आज की रात केवल जल पीकर ही बिताऊँगा। मुझे यही अच्छा लगता है।'॥10॥
 
'Sumitra Nandan! Although many kinds of wild fruits and roots can be found here, yet I will spend this night drinking only water. This seems good to me.'॥ 10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)