श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 45: नगर के वृद्ध ब्राह्मणों का श्रीराम से लौट चलने के लिये आग्रह करना तथा उन सबके साथ श्रीराम का तमसा तट पर पहुँचना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  2.45.23 
अनवाप्तातपत्रस्य रश्मिसंतापितस्य ते।
एभिश्छायां करिष्याम: स्वैश्छत्रैर्वाजपेयकै:॥ २३॥
 
 
अनुवाद
‘तुम्हें राजसी श्वेत छत्र नहीं मिला है, इसलिए तुम सूर्यदेव की किरणों से पीड़ित हो रहे हो। ऐसी स्थिति में हम वाजपेय यज्ञ से प्राप्त अपने छत्रों से तुम्हें छाया प्रदान करेंगे।॥ 23॥
 
‘You have not received the royal white umbrella, so you are getting tormented by the rays of the Sun God. In this situation, we will provide you shade with our umbrellas obtained in the Vajpayee Yagna.॥ 23॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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