श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 45: नगर के वृद्ध ब्राह्मणों का श्रीराम से लौट चलने के लिये आग्रह करना तथा उन सबके साथ श्रीराम का तमसा तट पर पहुँचना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  2.45.19 
द्विजातीन् हि पदातींस्तान् रामश्चारित्रवत्सल:।
न शशाक घृणाचक्षु: परिमोक्तुं रथेन स:॥ १९॥
 
 
अनुवाद
श्री रामचन्द्रजी के चरित्र में स्नेह गुण प्रधान था। उनकी दृष्टि करुणा से भरी हुई थी, इसलिए वे रथ पर सवार होकर पैदल चलने वाले उन ब्राह्मणों को पीछे छोड़ने का साहस नहीं कर सकते थे॥19॥
 
The quality of affection was predominant in the character of Shri Ramchandraji. His gaze was filled with compassion; therefore he could not dare to leave behind those Brahmins walking on foot by travelling in a chariot.॥ 19॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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