श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 45: नगर के वृद्ध ब्राह्मणों का श्रीराम से लौट चलने के लिये आग्रह करना तथा उन सबके साथ श्रीराम का तमसा तट पर पहुँचना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  2.45.16 
धर्मत: स विशुद्धात्मा वीर: शुभदृढव्रत:।
उपवाह्यस्तु वो भर्ता नापवाह्य: पुराद् वनम्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
तुम्हारे स्वामी श्री रामजी शुद्धात्मा, वीर और उत्तम व्रत का पालन करने वाले हैं, इसलिए तुम्हें उन्हें नगर के बाहर से नगर के निकट ले जाना चाहिए। नगर से वन में ले जाना तुम्हारे लिए उचित नहीं है॥16॥
 
‘Your master Shri Ram is pure of soul, brave and a firm follower of the best vow, therefore you should transport him – you should take him from outside to near the city. It is not at all proper for you to transport him from the city to the forest.’॥ 16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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