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श्लोक 2.44.29  |
अभिवाद्य नमस्यन्तं शूरं ससुहृदं सुतम्।
मुदास्रै: प्रोक्षसे पुत्रं मेघराजिरिवाचलम्॥ २९॥ |
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| अनुवाद |
| जैसे बादल पर्वत को नहला देते हैं, वैसे ही तुम भी अपने मित्रों के साथ हर्षाश्रुओं से अपने वीर पुत्र का स्वागत और अभिषेक करोगे॥29॥ |
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| 'Just as the clouds bathe the mountain, in the same way you will greet and anoint your brave son with tears of joy along with your friends.' 29॥ |
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