श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 43: महारानी कौसल्या का विलाप  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  2.43.8 
ते रत्नहीनास्तरुणा: फलकाले विवासिता:।
कथं वत्स्यन्ति कृपणा: फलमूलै: कृताशना:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
'उन तीनों युवकों को, जिन्हें सुख के फल भोगने चाहिए थे, बहुमूल्य वस्तुओं से वंचित करके घर से निकाल दिया गया। अब वे बेचारे जीव फल-मूल खाकर कैसे जीवित रहेंगे?॥8॥
 
‘Deprived of precious things, those three young men were thrown out of their homes when they should have enjoyed the fruits of happiness. Now how will those poor souls survive by eating fruits and roots?॥ 8॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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