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श्लोक 2.43.21  |
अयं हि मां दीपयतेऽद्य वह्नि-
स्तनूजशोकप्रभवो महाहित:।
महीमिमां रश्मिभिरुत्तमप्रभो
यथा निदाघे भगवान् दिवाकर:॥ २१॥ |
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| अनुवाद |
| 'जैसे ग्रीष्म ऋतु में सूर्य अपनी उत्तम किरणों से पृथ्वी को तपाता है, उसी प्रकार आज मेरे पुत्र के शोक से उत्पन्न यह अत्यन्त भयंकर अग्नि मुझे जला रही है।' |
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| 'Just as the Sun, with its excellent rays, heats up the earth during the summer season, similarly, this extremely harmful fire caused by the grief of my son is burning me today.' |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रिचत्वारिंश: सर्ग:॥ ४३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें तैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥४३॥ |
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