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श्लोक 2.43.20  |
न हि मे जीविते किंचित् सामर्थ्यमिह कल्प्यते।
अपश्यन्त्या: प्रियं पुत्रं लक्ष्मणं च महाबलम्॥ २०॥ |
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| अनुवाद |
| ‘अब मुझमें अपने प्रिय पुत्र श्री राम और महाबली लक्ष्मण को देखे बिना जीवित रहने की शक्ति नहीं है।॥ 20॥ |
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| ‘Now I do not have any strength to survive without seeing my beloved son Shri Ram and the mighty Lakshman.॥ 20॥ |
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