श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 42: राजा दशरथ का पृथ्वी पर गिरना, श्रीराम के लिये विलाप करना, कैकेयी को अपने पास आने से मना करना और उसे त्याग देना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  2.42.25 
महाह्रदमिवाक्षोभ्यं सुपर्णेन हृतोरगम्।
रामेण रहितं वेश्म वैदेह्या लक्ष्मणेन च॥ २५॥
 
 
अनुवाद
श्री राम, लक्ष्मण और सीता से रहित वह राजभवन उस विशाल अभेद्य जलाशय के समान प्रतीत हो रहा था, जिसके भीतर का सर्प गरुड़जी ने ले लिया था॥25॥
 
That royal palace, devoid of Shri Ram, Lakshman and Sita, looked like a great impenetrable reservoir, the serpent within which had been taken away by Garuda. 25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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