श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 42: राजा दशरथ का पृथ्वी पर गिरना, श्रीराम के लिये विलाप करना, कैकेयी को अपने पास आने से मना करना और उसे त्याग देना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  2.42.12 
निवृत्यैव निवृत्यैव सीदतो रथवर्त्मसु।
राज्ञो नातिबभौ रूपं ग्रस्तस्यांशुमतो यथा॥ १२॥
 
 
अनुवाद
राजा दशरथ बार-बार रथ पथ की ओर मुड़कर देखने का कष्ट करते थे। उस समय उनका रूप राहु से प्रभावित सूर्य के समान शोभायमान नहीं था। 12.
 
King Dasharatha would frequently take the trouble of looking back at the chariot paths. At that time his appearance was not very graceful like the Sun affected by Rahu. 12.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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