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श्लोक 2.41.21  |
ततस्त्वयोध्या रहिता महात्मना
पुरन्दरेणेव मही सपर्वता।
चचाल घोरं भयशोकदीपिता
सनागयोधाश्वगणा ननाद च॥ २१॥ |
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| अनुवाद |
| इस प्रकार श्री राम से रहित सम्पूर्ण अयोध्यापुरी भय और शोक से जल उठी और महान् त्राहि-त्राहि मच गई, जैसे इन्द्र के विहीन होने पर मेरु पर्वत सहित पृथ्वी काँप उठती है। हाथी, घोड़े और सैनिकों सहित उस नगरी में भयंकर हाहाकार मच गया। |
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| In this way, the entire Ayodhyapuri, devoid of Shri Ram, was in flames of fear and grief and was in great turmoil, just as the earth, including Mount Meru, shakes when it is devoid of Lord Indra. There was a terrible cry of anguish in that city, including the elephants, horses and soldiers. |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकचत्वारिंश: सर्ग:॥ ४१॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें इकतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४१॥ |
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