श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 41: श्रीराम के वनगमन से रनवास की स्त्रियों का विलाप तथा नगरनिवासियों की शोकाकुल अवस्था  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  2.41.1 
तस्मिंस्तु पुरुषव्याघ्रे निष्क्रामति कृताञ्जलौ।
आर्तशब्दो हि संजज्ञे स्त्रीणामन्त:पुरे महान्॥१॥
 
 
अनुवाद
नरसिंह श्री रामजी ने दूर से ही अपने पिता और माता को हाथ जोड़कर प्रणाम किया था। जब वे उस अवस्था में रथ पर सवार होकर नगर से बाहर जाने लगे, तो महल की रानियों में बड़ा कोलाहल मच गया।॥1॥
 
The lion of men, Shri Ram, had folded his hands for his father and mother from a distance. When in that state he began to leave the city in his chariot, there was a great uproar amongst the queens of the palace. ॥1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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