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ramayan 2.40.6: चाहे संकट हो या सुख, यही तुम्हारी अंतिम गति है। हे निष्पाप लक्ष्मण! इस संसार में सज्जनों का कर्तव्य है कि वे सदैव अपने बड़े भाई की आज्ञा में रहें।   |   ramayan सर्ग 2.40: सीता, राम और लक्ष्मण का दशरथ की परिक्रमा करके कौसल्या आदि को प्रणाम करना, सीता सहित श्रीराम और लक्ष्मण का रथ में बैठकर वन की ओर प्रस्थान   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 40: सीता, राम और लक्ष्मण का दशरथ की परिक्रमा करके कौसल्या आदि को प्रणाम करना, सीता सहित श्रीराम और लक्ष्मण का रथ में बैठकर वन की ओर प्रस्थान  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  2.40.6 
व्यसनी वा समृद्धो वा गतिरेष तवानघ।
एष लोके सतां धर्मो यज्ज्येष्ठवशगो भवेत्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
चाहे संकट हो या सुख, यही तुम्हारी अंतिम गति है। हे निष्पाप लक्ष्मण! इस संसार में सज्जनों का कर्तव्य है कि वे सदैव अपने बड़े भाई की आज्ञा में रहें।
 
‘Whether it is in trouble or in prosperity, this is your ultimate destination. Sinless Lakshman! It is the duty of good men in this world to always remain under the orders of their elder brother.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)