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श्लोक 2.40.51  |
तेषां वच: सर्वगुणोपपन्न:
प्रस्विन्नगात्र: प्रविषण्णरूप:।
निशम्य राजा कृपण: सभार्यो
व्यवस्थितस्तं सुतमीक्षमाण:॥ ५१॥ |
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| अनुवाद |
| सर्वगुण संपन्न राजा दशरथ का शरीर पसीने से भीग रहा था। वे दुःख के साक्षात स्वरूप प्रतीत हो रहे थे। अपने मंत्रियों के उपरोक्त वचन सुनकर वे वहीं खड़े हो गए और रानियों सहित अत्यंत विनम्रता से अपने पुत्र की ओर देखने लगे। |
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| The body of King Dashrath, who was blessed with all the virtues, was drenched in sweat. He seemed to be the embodiment of sadness. Hearing the above words of his ministers, he stood there and along with the queens started looking towards his son with utmost humility. |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चत्वारिंश: सर्ग:॥ ४०॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें चालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४०॥ |
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