श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 40: सीता, राम और लक्ष्मण का दशरथ की परिक्रमा करके कौसल्या आदि को प्रणाम करना, सीता सहित श्रीराम और लक्ष्मण का रथ में बैठकर वन की ओर प्रस्थान  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  2.40.43 
प्रत्यगारमिवायान्ती सवत्सा वत्सकारणात्।
बद्धवत्सा यथा धेनू राममाताभ्यधावत॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
जैसे सायंकाल के समय बछड़े को बाँधकर गाय अपने बछड़े के प्रति स्नेहवश घर की ओर दौड़ती हुई आती है, वैसे ही राम की माता कौशल्या भी उनकी ओर दौड़ी चली आ रही थीं॥ 43॥
 
Just as a cow with a tied calf comes running towards home in the evening out of affection for its calf, similarly Kausalya, the mother of Rama was coming running towards him.॥ 43॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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