श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 40: सीता, राम और लक्ष्मण का दशरथ की परिक्रमा करके कौसल्या आदि को प्रणाम करना, सीता सहित श्रीराम और लक्ष्मण का रथ में बैठकर वन की ओर प्रस्थान  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  2.40.42 
नहि तत् पुरुषव्याघ्रो दु:खजं दर्शनं पितु:।
मातुश्च सहितुं शक्तस्तोत्त्रैर्नुन्न इव द्विप:॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
जैसे हाथी को जब अंकुश से पीड़ा होती है, तब वह पीड़ा सहन नहीं कर सकता, उसी प्रकार सिंहहृदय श्री रामजी के लिए अपने माता-पिता की ऐसी दयनीय अवस्था देखना असह्य हो गया॥42॥
 
Just as an elephant cannot bear the pain when it is tormented by the goad, similarly for the lion-hearted Sri Rama it became unbearable to see his parents in such a pitiable state. ॥ 42॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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