श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 40: सीता, राम और लक्ष्मण का दशरथ की परिक्रमा करके कौसल्या आदि को प्रणाम करना, सीता सहित श्रीराम और लक्ष्मण का रथ में बैठकर वन की ओर प्रस्थान  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  2.40.32 
रामो याहीति तं सूतं तिष्ठेति च जनस्तथा।
उभयं नाशकत् सूत: कर्तुमध्वनि चोदित:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
एक ओर श्री रामचन्द्रजी सारथी को रथ हाँकने को कह रहे थे और दूसरी ओर सारी भीड़ उसे रोकने को कह रही थी। इस दुविधा में पड़े हुए सारथी सुमन्तराम उस मार्ग पर न तो कुछ कर सकते थे - न रथ को आगे बढ़ा सकते थे और न उसे पूरी तरह रोक सकते थे॥ 32॥
 
On one side Shri Ramchandraji was telling the charioteer to drive the chariot and on the other side the whole crowd was telling him to stop. Being in this dilemma the charioteer Sumantram could do neither on that road - neither he could move the chariot forward nor he could stop it completely.॥ 32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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