श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 40: सीता, राम और लक्ष्मण का दशरथ की परिक्रमा करके कौसल्या आदि को प्रणाम करना, सीता सहित श्रीराम और लक्ष्मण का रथ में बैठकर वन की ओर प्रस्थान  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  2.40.23 
आयसं हृदयं नूनं राममातुरसंशयम्।
यद् देवगर्भप्रतिमे वनं याति न भिद्यते॥ २३॥
 
 
अनुवाद
श्री रामचन्द्रजी की माता का हृदय निश्चय ही लोहे का बना है, इसमें कोई संदेह नहीं। इसीलिए देवकुमार के समान तेजस्वी पुत्र के वन में चले जाने पर भी वह फटता नहीं।
 
Certainly the heart of Shri Ramchandra's mother is made of iron, there is no doubt about it. That is why it does not burst when her son, who is as brilliant as Devkumar, goes to the forest. 23.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas