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श्लोक  2.4.10 
प्रविशन्नेव च श्रीमान् राघवो भवनं पितु:।
ददर्श पितरं दूरात् प्रणिपत्य कृताञ्जलि:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
जैसे ही वे अपने पिता के महल में प्रविष्ट हुए, श्रीमान् रघुनाथजी ने उन्हें देखा और दूर से ही हाथ जोड़कर उनके चरणों में गिर पड़े।
 
As soon as he entered his father's palace, Shriman Raghunathji saw him and fell at his feet with folded hands from a distance.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)