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ramayan 2.39.6: 'अहा! मैं अपने अग्नि के समान तेजस्वी पुत्र को अपने सामने खड़ा देखता हूँ, जिसने उत्तम वस्त्र त्यागकर तपस्वियों के समान छाल के वस्त्र धारण कर लिए हैं (तथापि मेरा प्राण मुझसे दूर नहीं हो रहा है)।॥6॥   |   ramayan सर्ग 2.39: राजा दशरथ का विलाप,कौसल्या का सीता को पतिसेवा का उपदेश, सीता के द्वारा उसकी स्वीकृति   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 39: राजा दशरथ का विलाप,कौसल्या का सीता को पतिसेवा का उपदेश, सीता के द्वारा उसकी स्वीकृति  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  2.39.6 
योऽहं पावकसंकाशं पश्यामि पुरत: स्थितम्।
विहाय वसने सूक्ष्मे तापसाच्छादमात्मजम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
'अहा! मैं अपने अग्नि के समान तेजस्वी पुत्र को अपने सामने खड़ा देखता हूँ, जिसने उत्तम वस्त्र त्यागकर तपस्वियों के समान छाल के वस्त्र धारण कर लिए हैं (तथापि मेरा प्राण मुझसे दूर नहीं हो रहा है)।॥6॥
 
'Oh! I see my son, who is as radiant as fire, standing before me, having discarded his fine clothes and wearing bark clothes like those of ascetics (yet my life does not leave me).॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)