श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 39: राजा दशरथ का विलाप,कौसल्या का सीता को पतिसेवा का उपदेश, सीता के द्वारा उसकी स्वीकृति  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.39.5 
न त्वेवानागते काले देहाच्च्यवति जीवितम्।
कैकेय्या क्लिश्यमानस्य मृत्युर्मम न विद्यते॥ ५॥
 
 
अनुवाद
‘समय पूरा होने से पहले आत्मा शरीर को नहीं छोड़ती; इसीलिए कैकेयी द्वारा इतना कष्ट दिए जाने पर भी मैं नहीं मर रहा हूँ॥5॥
 
‘The soul does not leave a person's body before the time is up; that is why I am not dying even after being tormented so much by Kaikeyi.॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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