श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 39: राजा दशरथ का विलाप,कौसल्या का सीता को पतिसेवा का उपदेश, सीता के द्वारा उसकी स्वीकृति  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  2.39.38 
संवासात् परुषं किंचिदज्ञानादपि यत् कृतम्।
तन्मे समुपजानीत सर्वाश्चामन्त्रयामि व:॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
हे माताओ! मेरे द्वारा कहे गए किसी भी कटु वचन अथवा सर्वदा साथ रहने के कारण अनजाने में हुई किसी भी भूल के लिए मुझे क्षमा करें। मैं आप सभी माताओं से विदा लेता हूँ।॥38॥
 
‘Mothers! Please forgive me for any harsh words I may have said or any mistakes I may have committed unknowingly due to being together all the time. I take leave from all you mothers.'॥ 38॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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