श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 39: राजा दशरथ का विलाप,कौसल्या का सीता को पतिसेवा का उपदेश, सीता के द्वारा उसकी स्वीकृति  »  श्लोक 36-37
 
 
श्लोक  2.39.36-37 
एतावदभिनीतार्थमुक्त्वा स जननीं वच:।
त्रय: शतशतार्धा हि ददर्शावेक्ष्य मातर:॥ ३६॥
ताश्चापि स तथैवार्ता मातॄर्दशरथात्मज:।
धर्मयुक्तमिदं वाक्यं निजगाद कृताञ्जलि:॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार अपनी माता से अपना निश्चयपूर्वक कहाकर दशरथनन्दन श्री राम ने अपनी अन्य तीन सौ पचास माताओं की ओर देखा और उन्हें भी कौसल्या के समान शोकग्रस्त पाया। तब उन्होंने हाथ जोड़कर उनसे यह सब धर्मपूर्ण बात कही -॥36-37॥
 
Having thus told his mother his definite intention, Dasarathanandan Shri Ram looked at his other three hundred and fifty mothers and found them also grieving like Kausalya. Then he folded his hands and told them all this righteous thing -॥36-37॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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