श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 39: राजा दशरथ का विलाप,कौसल्या का सीता को पतिसेवा का उपदेश, सीता के द्वारा उसकी स्वीकृति  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  2.39.34 
अम्ब मा दु:खिता भूत्वा पश्येस्त्वं पितरं मम।
क्षयोऽपि वनवासस्य क्षिप्रमेव भविष्यति॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
'माता! (यह मानकर कि उन्हीं के कारण मेरे पुत्र को वनवास हुआ है) आप मेरे पिता की ओर दुःख से न देखें। वनवास की अवधि भी शीघ्र ही समाप्त हो जाएगी॥ 34॥
 
‘Mother! (Believing that it is because of them that my son has been exiled) you should not look at my father with sorrow. The period of exile will also end soon.॥ 34॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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