श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 39: राजा दशरथ का विलाप,कौसल्या का सीता को पतिसेवा का उपदेश, सीता के द्वारा उसकी स्वीकृति  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  2.39.31 
साहमेवंगता श्रेष्ठा श्रुतधर्मपरावरा।
आर्ये किमवमन्येयं स्त्रिया भर्ता हि दैवतम्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
'आर्य! मैंने महान स्त्रियों, माताओं आदि के मुख से स्त्रियों के सामान्य और विशेष धर्म सुने हैं। इस प्रकार पतिव्रत धर्म का महत्त्व जानकर भी मैं अपने पति का अपमान क्यों करूँ? मैं जानती हूँ कि पति ही स्त्री का देवता है। 31॥
 
'Arye! I have heard the general and special religions of women from the mouths of great women, mothers etc. In this way, why would I insult my husband even after knowing the importance of patriotism? I know that husband is the god of woman. 31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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