श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 39: राजा दशरथ का विलाप,कौसल्या का सीता को पतिसेवा का उपदेश, सीता के द्वारा उसकी स्वीकृति  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  2.39.28 
न मामसज्जनेनार्या समानयितुमर्हति।
धर्माद् विचलितुं नाहमलं चन्द्रादिव प्रभा॥ २८॥
 
 
अनुवाद
‘हे माता! आप मुझे दुष्ट स्त्रियों के समान न समझें; क्योंकि जैसे चन्द्रमा का तेज नष्ट नहीं हो सकता, वैसे ही मैं भी अपने पतिव्रता धर्म से विमुख नहीं हो सकती।॥28॥
 
‘Respected Mother! You should not consider me to be like the wicked women; because just as the radiance cannot go away from the moon, in the same way I cannot deviate from my duty of being faithful to my husband.॥ 28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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