श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 39: राजा दशरथ का विलाप,कौसल्या का सीता को पतिसेवा का उपदेश, सीता के द्वारा उसकी स्वीकृति  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  2.39.26 
विज्ञाय वचनं सीता तस्या धर्मार्थसंहितम्।
कृत्वाञ्जलिमुवाचेदं श्वश्रूमभिमुखे स्थिता॥ २६॥
 
 
अनुवाद
अपनी सास के धार्मिक एवं अर्थपूर्ण वचनों का आशय भलीभाँति समझकर सीता उनके समक्ष खड़ी हो गईं और हाथ जोड़कर उनसे इस प्रकार बोलीं -॥26॥
 
Having fully understood the import of the religious and meaningful words of her mother-in-law, Sita stood before her and with folded hands spoke to her as follows -॥ 26॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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