श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 39: राजा दशरथ का विलाप,कौसल्या का सीता को पतिसेवा का उपदेश, सीता के द्वारा उसकी स्वीकृति  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  2.39.25 
स त्वया नावमन्तव्य: पुत्र: प्रव्राजितो वनम्।
तव देवसमस्त्वेष निर्धन: सधनोऽपि वा॥ २५॥
 
 
अनुवाद
‘इसलिए तुम मेरे पुत्र श्री रामजी का, जिन्हें वन जाने का आदेश दिया गया है, कभी अनादर न करना। चाहे वे निर्धन हों या धनवान, वे तुम्हारे लिए देवता के समान हैं।’॥25॥
 
‘Therefore you should never disrespect my son Shri Ram, who has been ordered to go to the forest. Whether he is poor or rich, he is like a god to you.’॥ 25॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd