| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » सर्ग 39: राजा दशरथ का विलाप,कौसल्या का सीता को पतिसेवा का उपदेश, सीता के द्वारा उसकी स्वीकृति » श्लोक 23 |
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| | | | श्लोक 2.39.23  | न कुलं न कृतं विद्या न दत्तं नापि संग्रह:।
स्त्रीणां गृह्णाति हृदयमनित्यहृदया हि ता:॥ २३॥ | | | | | | अनुवाद | | 'उत्तम कुल, उपकार, विद्या, आभूषण आदि का दान और संग्रह (पति द्वारा स्नेहपूर्वक गोद लिया जाना), ये सब दुष्ट स्त्रियों के हृदय को वश में नहीं कर सकते; क्योंकि उनका मन अशांत रहता है। | | | | 'A good family, favours done, knowledge, gifts of ornaments etc. and collection (of affectionate adoption by the husband), all these cannot subdue the heart of wicked women; because their mind is disturbed. | | ✨ ai-generated | | |
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