श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 39: राजा दशरथ का विलाप,कौसल्या का सीता को पतिसेवा का उपदेश, सीता के द्वारा उसकी स्वीकृति  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  2.39.22 
असत्यशीला विकृता दुर्गा अहृदया: सदा।
असत्य: पापसंकल्पा: क्षणमात्रविरागिण:॥ २२॥
 
 
अनुवाद
जो झूठ बोलती हैं, कुकर्म करती हैं, दुष्ट पुरुषों की संगति करती हैं, अपने पति के प्रति निर्दयी हैं, दुराचारी हैं, पाप की योजना बनाती हैं और छोटी-छोटी बातों पर भी क्षण भर में अपने पति से विमुख हो जाती हैं, वे सब असति या दुष्ट मानी जाती हैं॥ 22॥
 
'Those who tell lies, indulge in perverted acts, keep company with wicked men, are heartless towards their husbands, are immoral, plan sins and turn away from their husbands in a moment even for small matters, are all considered as asati or wicked.॥ 22॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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