श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 39: राजा दशरथ का विलाप,कौसल्या का सीता को पतिसेवा का उपदेश, सीता के द्वारा उसकी स्वीकृति  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  2.39.19 
तां भुजाभ्यां परिष्वज्य श्वश्रूर्वचनमब्रवीत्।
अनाचरन्तीं कृपणं मूर्ध्न्युपाघ्राय मैथिलीम्॥ १९॥
 
 
अनुवाद
उस समय माता कौशल्या ने कभी दुःखी न होने वाली मिथिला की पुत्री सीता को दोनों भुजाओं से कसकर गले लगाया और उनका माथा सूंघकर कहा -॥19॥
 
At that time, mother-in-law Kausalya hugged Sita, the daughter of Mithila, who never behaved sadly, tightly with both her arms and smelling her forehead said -॥19॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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