श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 39: राजा दशरथ का विलाप,कौसल्या का सीता को पतिसेवा का उपदेश, सीता के द्वारा उसकी स्वीकृति  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.39.17 
सा सुजाता सुजातानि वैदेही प्रस्थिता वनम्।
भूषयामास गात्राणि तैर्विचित्रैर्विभूषणै:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
विदेहकुमारी सीता ने, जो कुलीन कुल में उत्पन्न हुई थीं अथवा आयोनिज और वनवास को प्राप्त हुई थीं, उन विचित्र आभूषणों से अपने सुन्दर अंगों को सुशोभित किया ॥17॥
 
Videhakumari Sita, who was born in a noble family or was destined for Ionija and exile, adorned all her body parts with beautiful features with those strange ornaments. 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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