श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 39: राजा दशरथ का विलाप,कौसल्या का सीता को पतिसेवा का उपदेश, सीता के द्वारा उसकी स्वीकृति  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  2.39.14 
राजा सत्वरमाहूय व्यापृतं वित्तसंचये।
उवाच देशकालज्ञो निश्चितं सर्वत: शुचि:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
तब देश और काल को जानने वाले तथा सब प्रकार से शुद्ध (इस लोक और परलोक के ऋण से मुक्त) राजा दशरथ ने धन-संग्रह के कार्य में नियुक्त कोषाध्यक्ष को तुरन्त बुलाकर यह निश्चित बात कही -॥14॥
 
Then King Dasharatha, who understood the place and time and was pure in all respects (free from debts of this world and the next), immediately called the treasurer appointed for the business of wealth collection and said this definite thing -॥ 14॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd