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श्लोक 2.38.5  |
इयं हि कस्यापि करोति किंचित्
तपस्विनी राजवरस्य पुत्री।
या चीरमासाद्य जनस्य मध्ये
स्थिता विसंज्ञा श्रमणीव काचित् ॥ ५॥ |
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| अनुवाद |
| राजाओं में श्रेष्ठ जनक की यह तपस्वी कन्या, जब भीड़ में भिखारिन के समान चिथड़े पहने खड़ी रहती है, तब क्या वह किसी का अनिष्ट करती है?॥5॥ |
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| ‘Is this ascetic daughter of Janaka, the best of kings, causing harm to anyone, when she stands in the midst of a crowd wearing a rag like a beggar bewildered?॥ 5॥ |
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