श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 38: राजा दशरथ का सीता को वल्कल धारण कराना अनुचित बताकर कैकेयी को फटकारना और श्रीराम का उनसे कौसल्या पर कृपादृष्टि रखने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.38.5 
इयं हि कस्यापि करोति किंचित्
तपस्विनी राजवरस्य पुत्री।
या चीरमासाद्य जनस्य मध्ये
स्थिता विसंज्ञा श्रमणीव काचित् ॥ ५॥
 
 
अनुवाद
राजाओं में श्रेष्ठ जनक की यह तपस्वी कन्या, जब भीड़ में भिखारिन के समान चिथड़े पहने खड़ी रहती है, तब क्या वह किसी का अनिष्ट करती है?॥5॥
 
‘Is this ascetic daughter of Janaka, the best of kings, causing harm to anyone, when she stands in the midst of a crowd wearing a rag like a beggar bewildered?॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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