श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 38: राजा दशरथ का सीता को वल्कल धारण कराना अनुचित बताकर कैकेयी को फटकारना और श्रीराम का उनसे कौसल्या पर कृपादृष्टि रखने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  2.38.4 
सुकुमारी च बाला च सततं च सुखोचिता।
नेयं वनस्य योग्येति सत्यमाह गुरुर्मम॥ ४॥
 
 
अनुवाद
'वह एक सुकुमार कन्या है और उसका पालन-पोषण सदैव सुखपूर्वक हुआ है। मेरे गुरु ठीक ही कहते हैं कि सीता वन जाने के योग्य नहीं है।॥4॥
 
'She is a tender girl and has always been brought up in comfort. My Guru is right in saying that Sita is not fit to go to the forest.॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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