श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 38: राजा दशरथ का सीता को वल्कल धारण कराना अनुचित बताकर कैकेयी को फटकारना और श्रीराम का उनसे कौसल्या पर कृपादृष्टि रखने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 2-3
 
 
श्लोक  2.38.2-3 
तेन तत्र प्रणादेन दु:खित: स महीपति:।
चिच्छेद जीविते श्रद्धां धर्मे यशसि चात्मन:॥ २॥
स नि:श्वस्योष्णमैक्ष्वाकस्तां भार्यामिदमब्रवीत्।
कैकेयि कुशचीरेण न सीता गन्तुमर्हति॥ ३॥
 
 
अनुवाद
इस कोलाहल से दुःखी होकर इक्ष्वाकुवंशी राजा दशरथ ने जीवन, धर्म और यश की प्रबल इच्छा त्याग दी। फिर वे गहरी साँस लेकर अपनी पत्नी कैकेयी से इस प्रकार बोले - 'कैकेयी! सीता कुशा-कपड़े (छाल के वस्त्र) पहनकर वन में जाने के योग्य नहीं है।॥ 2-3॥
 
Saddened by the uproar, King Dasharath of the Ikshwaku dynasty gave up his ardent desire for life, religion and fame. Then he took a deep breath and spoke to his wife Kaikeyi thus - 'Kaikeyi! Sita is not fit to go to the forest wearing kusha-rags (bark clothes).॥ 2-3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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