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श्लोक 2.38.17  |
इमां महेन्द्रोपम जातगर्धिनीं
तथा विधातुं जननीं ममार्हसि।
यथा वनस्थे मयि शोककर्शिता
न जीवितं न्यस्य यमक्षयं व्रजेत्॥ १७॥ |
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| अनुवाद |
| हे राजन! इन्द्र के समान तेजस्वी! वह अपने खोए हुए पुत्र को देखने के लिए सदैव व्याकुल रहेगी। ऐसा हो सकता है कि मेरे वन में रहते हुए वह शोक से व्याकुल होकर प्राण त्यागकर यमलोक चली जाए। अतः आप मेरी माता को सदैव ऐसी स्थिति में रखें कि पूर्वोक्त भय की कोई गुंजाइश न रहे।॥17॥ |
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| 'O King, who is as illustrious as Indra! She will always be anxious to see her lost son. It may happen that while I am in the forest, she may be overcome with grief and give up her life and go to Yamaloka. Therefore, please always keep my mother in such a condition that there is no scope for the above mentioned fear.'॥ 17॥ |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टात्रिंश: सर्ग:॥ ३८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें अड़तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३८॥ |
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