श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 38: राजा दशरथ का सीता को वल्कल धारण कराना अनुचित बताकर कैकेयी को फटकारना और श्रीराम का उनसे कौसल्या पर कृपादृष्टि रखने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  2.38.10 
ननु पर्याप्तमेवं ते पापे रामविवासनम्।
किमेभि: कृपणैर्भूय: पातकैरपि ते कृतै:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
‘पापी! तूने श्री राम को वन में भेजकर तो सब पाप कर ही लिए हैं। अब सीता को वन में भेजकर तथा उन्हें छाल के वस्त्र आदि पहनाकर यह अत्यन्त दुःखद कार्य करके तू इतने पाप क्यों कर रहा है?॥10॥
 
‘Sinner! You have already committed all the sins by sending Shri Ram to the forest. Now why are you committing so many sins by doing the very sad act of sending Sita to the forest and making her wear bark clothes etc.?॥10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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